जी रहे है लोग कैसे
जी रहे है लोग कैसे
आज के वातावरण में
सभ्यता की मांग सुनी
कोयले सर धुन रही है
बैठ कौवों की शरण में
घोर कलयुग है की दोनों
राम रावन एक से है
लक्ष्म्नो का हाँथ रहता
आजकल सीता हरण में
शब्द निरर्थक बन चुके है
अर्थ घोर अन्रर्थ करते
संधि कम विग्रह अधिक है
जिंदगी के व्याकरण में
झांकता है क्यों अँधेरा
सूर्य की पहली किरण में !
जी रहे है लोग कैसे
आज के वातावरण में !
यह कविता क्यों ? आज जीवन का अर्थ ही निरर्थक बन गया है हर जगह विग्रह फैला हुआ है !
अरविन्द योगी




जी रहे है लोग कैसे
आज के वातावरण में
सभ्यता की मांग सुनी
कोयले सर धुन रही है
बैठ कौवों की शरण में
घोर कलयुग है की दोनों
राम रावन एक से है
लक्ष्म्नो का हाँथ रहता
आजकल सीता हरण में
शब्द निरर्थक बन चुके है
अर्थ घोर अन्रर्थ करते
संधि कम विग्रह अधिक है
जिंदगी के व्याकरण में
झांकता है क्यों अँधेरा
सूर्य की पहली किरण में !
जी रहे है लोग कैसे
आज के वातावरण में !
यह कविता क्यों ? आज जीवन का अर्थ ही निरर्थक बन गया है हर जगह विग्रह फैला हुआ है !
अरविन्द योगी





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