उजालों की कशिश वो समझती है
उजालों की कशिश वो समझती है
ज़िन्दगी जो अंधेरों में भटकती है !
हमसफ़र ना कोई ,ज़िन्दगी चलती है
सांसो में कमी उसकी हर पल खलती है !
काँटों पे चैन से सोती है ज़िन्दगी
शोलों पे हंसके चलती है ज़िन्दगी
कौन कहता ज़िन्दगी मरती है
मरके भी ज़िन्दगी याद रहती है!
रोशनी से तलबगार हर कोई यहाँ
अँधेरी रात भी बहुत कुछ कहती है
तुफानो से मुस्कराके ज़िन्दगी जो लडती है
अंधेरों में बन उम्मीद ज़िन्दगी वो जलती है !
प्रीत बन प्रियतम से प्रिय जो बिछदती है
प्यार की हर रीत के गीत वो समझती है !
विरह में प्यार के प्रीत जो भटकती है
योगी प्यार की रीत वो समझती है !
ज़िन्दगी जो अंधेरों से गुजरती है !
उजालों की कशिश वो समझती है !
यह रचना क्यों ? दूरियां भी जीना सिखाती हैं मजबूरियां लड़ना सिखाती हैं और जब मामला प्यार का हो फिर क्या कहने ?
अरविन्द योगी
Thursday, 29 December 2011
Monday, 26 September 2011
मन भटक जाता है
मन भटक जाता है
मै हर गली हर चौखट जाता हूँ
प्यार की हवा में बहक जाता हूँ
चाय की गली में ठहर जाता हूँ
पान में डूबा पूरा शहर पाता हूँ
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !-------------
यहाँ हर पल होता हवन है
सबमे भक्ति है बड़ा लगन है
हर गली में मंदिर है भवन है
यहाँ धन्य हर जनम ,मुक्ति हर मरण है
भोलेनाथ का शरण है हर मन मगन है
जाने क्यों मन चंचल है बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !---------------
कचौड़ी गली, खोवा गली, श्रींगार गली, विश्वनाथ गली
मस्जिद गली मंदिर गली , राम गली हनुमान गली
जाने कितनी गली , गलियों में गली
दिल को लगती भली यहाँ जीवन चली
जीवन की गली शिव की गली
गलियों का शहर मंदिरों का नगर
मन हर पल यहाँ ठहर जाता है
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !------------------
भंग का लहर पहर दो पहर
भाव का शहर शिव का नगर
शान का शहर सम्मान का नगर
स्वाभिमान का शहर शिव का घर
यहाँ हर गली में इन्सान का घर
भगवान का घर बनारस शहर
मन मचल जाता है भाव ठहर जाता है
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !------------------
घाटों का घाट शिव का बाँट
राज घाट, राम घाट , हरिश्चंद्र ,मर्निकनिका घाट
प्रह्लाद घाट हनुमान घाट ,त्रिलोचन घाट केदार घाट
सबका करता उद्धार घाट, संसार का है घोसला घाट
बनारस का हर घाट है हर जीवन की बाँट
घाटों पे ठहर जाता है नया जनम पाता है
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !------------------
यह कविता क्यों ? बनारस गलियों का शहर है मंदिरों का नगर है शिव का घर है जीवन का घाट है उस बनारस की क्या बात है जहाँ जलधर भोलेनाथ सबका कल्याण करते है मन का संताप हरते है ! जय विश्वनाथ भोलेनाथ रसारस बनारस हे मन बना रहे बनारस अरविन्द योगी
मै हर गली हर चौखट जाता हूँ
प्यार की हवा में बहक जाता हूँ
चाय की गली में ठहर जाता हूँ
पान में डूबा पूरा शहर पाता हूँ
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !-------------
यहाँ हर पल होता हवन है
सबमे भक्ति है बड़ा लगन है
हर गली में मंदिर है भवन है
यहाँ धन्य हर जनम ,मुक्ति हर मरण है
भोलेनाथ का शरण है हर मन मगन है
जाने क्यों मन चंचल है बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !---------------
कचौड़ी गली, खोवा गली, श्रींगार गली, विश्वनाथ गली
मस्जिद गली मंदिर गली , राम गली हनुमान गली
जाने कितनी गली , गलियों में गली
दिल को लगती भली यहाँ जीवन चली
जीवन की गली शिव की गली
गलियों का शहर मंदिरों का नगर
मन हर पल यहाँ ठहर जाता है
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !------------------
भंग का लहर पहर दो पहर
भाव का शहर शिव का नगर
शान का शहर सम्मान का नगर
स्वाभिमान का शहर शिव का घर
यहाँ हर गली में इन्सान का घर
भगवान का घर बनारस शहर
मन मचल जाता है भाव ठहर जाता है
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !------------------
घाटों का घाट शिव का बाँट
राज घाट, राम घाट , हरिश्चंद्र ,मर्निकनिका घाट
प्रह्लाद घाट हनुमान घाट ,त्रिलोचन घाट केदार घाट
सबका करता उद्धार घाट, संसार का है घोसला घाट
बनारस का हर घाट है हर जीवन की बाँट
घाटों पे ठहर जाता है नया जनम पाता है
जाने क्यों बनारस की गलियों में
मन भटक जाता है !------------------
यह कविता क्यों ? बनारस गलियों का शहर है मंदिरों का नगर है शिव का घर है जीवन का घाट है उस बनारस की क्या बात है जहाँ जलधर भोलेनाथ सबका कल्याण करते है मन का संताप हरते है ! जय विश्वनाथ भोलेनाथ रसारस बनारस हे मन बना रहे बनारस अरविन्द योगी
Thursday, 1 September 2011
किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा
कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा
काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा
किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा
देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा
और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा
ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
योगी ग़र ये खेल ही दोबारा होगा !
यह कविता क्यों मोहब्बत एक एहसास है हवा का झोंका है फूलों की खुशबू है मन का संगीत है एक निस्वार्थ प्रीत है रिश्तों की अजीब सी अनकही सी रीत है मोहब्बत कोई शब्द नहीं अर्थ है जीवन का !
अरविन्द योगी
किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा
कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा
काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा
किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा
देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा
और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा
ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
योगी ग़र ये खेल ही दोबारा होगा !
यह कविता क्यों मोहब्बत एक एहसास है हवा का झोंका है फूलों की खुशबू है मन का संगीत है एक निस्वार्थ प्रीत है रिश्तों की अजीब सी अनकही सी रीत है मोहब्बत कोई शब्द नहीं अर्थ है जीवन का !
अरविन्द योगी
Saturday, 23 July 2011
बड़ा ही मनभावन है बनारस का सावन
बारिश के बूंदों में डूबा मन
चन्दन से शीतल हुआ तन
शिवमय हो बहती चंचल पवन
भावनामय हो जलती हवन
धन्य हो जाये जहाँ जीवन
धन्य हो जाये जहाँ मरण
आज सावन आया है
उस बनाराश की शरण !
बारिश की बूंदों में डूबता कण-कण
योगी बन काशी में घूमता तन-मन
गंगा की लहर भाव की भंवर
उगते सूरज का शहर ,मंदिरों का नगर
आज बादलों की जद में है, सावन की हद में है
जहाँ सूरज भी डूबता है चाँद भी उगता है
ह्रदय से हँसता हर मन दिखता है
जहाँ हर भाव दिखता है बिकता है
भावना की हर रात में भक्ति की हर बात में
सावन में जब बनारस डूबता है !
जिसे सृष्टि का कण कण पूजता है
ऐसा है मन भावन बनारस का सावन !
पंक्ति में खड़ी भक्ति है जिसमे शिव शक्ति है
मस्ती में डूबी हर बस्ती है भावना भी सस्ती है
चली फिर आज सावन की कश्ती है
सस्ती से सस्ती है मस्ती से मस्ती है
शिव को समर्पित सावन की भक्ति है
शक्ति को अर्पित सावन की मस्ती है
आज उगते सूरज के शहर में
आज सावन की मस्ती है !
यह कविता क्यों ? बड़ा ही मनभावन है बनारस का सावन जहाँ कण कण शिवमय हो जाता है रसमय हो जाता है शाशिमय हो जाता है सब रसमय हो जाता है जब बनारस में सावन आता है !
अरविन्द योगी
चन्दन से शीतल हुआ तन
शिवमय हो बहती चंचल पवन
भावनामय हो जलती हवन
धन्य हो जाये जहाँ जीवन
धन्य हो जाये जहाँ मरण
आज सावन आया है
उस बनाराश की शरण !
बारिश की बूंदों में डूबता कण-कण
योगी बन काशी में घूमता तन-मन
गंगा की लहर भाव की भंवर
उगते सूरज का शहर ,मंदिरों का नगर
आज बादलों की जद में है, सावन की हद में है
जहाँ सूरज भी डूबता है चाँद भी उगता है
ह्रदय से हँसता हर मन दिखता है
जहाँ हर भाव दिखता है बिकता है
भावना की हर रात में भक्ति की हर बात में
सावन में जब बनारस डूबता है !
जिसे सृष्टि का कण कण पूजता है
ऐसा है मन भावन बनारस का सावन !
पंक्ति में खड़ी भक्ति है जिसमे शिव शक्ति है
मस्ती में डूबी हर बस्ती है भावना भी सस्ती है
चली फिर आज सावन की कश्ती है
सस्ती से सस्ती है मस्ती से मस्ती है
शिव को समर्पित सावन की भक्ति है
शक्ति को अर्पित सावन की मस्ती है
आज उगते सूरज के शहर में
आज सावन की मस्ती है !
यह कविता क्यों ? बड़ा ही मनभावन है बनारस का सावन जहाँ कण कण शिवमय हो जाता है रसमय हो जाता है शाशिमय हो जाता है सब रसमय हो जाता है जब बनारस में सावन आता है !
अरविन्द योगी
हे प्रभो तुम कहाँ हो ?
हे प्रभो ! तुम कहाँ हो ?
जहाँ देखो तुम वहां हो
मन में हो तन में हो
सृष्टि के कण कण में हो
मै अकिंचन जित खोजा
तित पाया तुमको
रोम रोम में धरा व्योम में
बेचारा चंचल सा मन
खोजता रहा हर जनम
करता रहा हर करम
तुझे पाने की तुझमे सामने की
पर तुम मेरे अंतर्मन में हो
सृष्टि के जन-जन में हो
पर बांवरा सा मेरा मन
तेरा अस्तित्व अनंत
खोजता है योगी सोचता है
तुम कहाँ हो? तुम कहाँ हो?
जहाँ तक दृष्टि पड़ती
तुम वहां हो फिर भी
हे प्रभो तुम कहाँ हो ?
यह कविता क्यों ? चंचल मन अंतर्मन में कल्पनाओं के पंख लगाकर अनंत सृष्टि में कौतुक दृष्टि से जिस ईश्वर की खोज यात्रा करता है सृष्टि के कण कण में है जीवन में है पर मन तो मन है न पूछ ही बैठता है की आखिर दुनिया की नाव चलने वाले नाविक प्रभो! तुम कहाँ हो ?
अरविन्द योगी
जहाँ देखो तुम वहां हो
मन में हो तन में हो
सृष्टि के कण कण में हो
मै अकिंचन जित खोजा
तित पाया तुमको
रोम रोम में धरा व्योम में
बेचारा चंचल सा मन
खोजता रहा हर जनम
करता रहा हर करम
तुझे पाने की तुझमे सामने की
पर तुम मेरे अंतर्मन में हो
सृष्टि के जन-जन में हो
पर बांवरा सा मेरा मन
तेरा अस्तित्व अनंत
खोजता है योगी सोचता है
तुम कहाँ हो? तुम कहाँ हो?
जहाँ तक दृष्टि पड़ती
तुम वहां हो फिर भी
हे प्रभो तुम कहाँ हो ?
यह कविता क्यों ? चंचल मन अंतर्मन में कल्पनाओं के पंख लगाकर अनंत सृष्टि में कौतुक दृष्टि से जिस ईश्वर की खोज यात्रा करता है सृष्टि के कण कण में है जीवन में है पर मन तो मन है न पूछ ही बैठता है की आखिर दुनिया की नाव चलने वाले नाविक प्रभो! तुम कहाँ हो ?
अरविन्द योगी
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