Thursday, 1 September 2011

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा

किसी की आँखों मे मोहब्बत का सितारा होगा
एक दिन आएगा कि कोई शक्स हमारा होगा
कोई जहाँ मेरे लिए मोती भरी सीपियाँ चुनता होगा
वो किसी और दुनिया का किनारा होगा

काम मुश्किल है मगर जीत ही लूगाँ किसी दिल को
मेरे खुदा का अगर ज़रा भी सहारा होगा
किसी के होने पर मेरी साँसे चलेगीं
कोई तो होगा जिसके बिना ना मेरा गुज़ारा होगा

देखो ये अचानक ऊजाला हो चला,
दिल कहता है कि शायद किसी ने धीमे से मेरा नाम पुकारा होगा
और यहाँ देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा

कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा

ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
योगी ग़र ये खेल ही दोबारा होगा !

यह कविता क्यों मोहब्बत एक एहसास है हवा का झोंका है फूलों की खुशबू है मन का संगीत है एक निस्वार्थ प्रीत है रिश्तों की अजीब सी अनकही सी रीत है मोहब्बत कोई शब्द नहीं अर्थ है जीवन का !
अरविन्द योगी

Saturday, 23 July 2011

बड़ा ही मनभावन है बनारस का सावन

बारिश के बूंदों में डूबा मन
चन्दन से शीतल हुआ तन
शिवमय हो बहती चंचल पवन
भावनामय हो जलती हवन
धन्य हो जाये जहाँ जीवन
धन्य हो जाये जहाँ मरण
आज सावन आया है
उस बनाराश की शरण !

बारिश की बूंदों में डूबता कण-कण
योगी बन काशी में घूमता तन-मन
गंगा की लहर भाव की भंवर
उगते सूरज का शहर ,मंदिरों का नगर
आज बादलों की जद में है, सावन की हद में है
जहाँ सूरज भी डूबता है चाँद भी उगता है
ह्रदय से हँसता हर मन दिखता है
जहाँ हर भाव दिखता है बिकता है
भावना की हर रात में भक्ति की हर बात में
सावन में जब बनारस डूबता है !
जिसे सृष्टि का कण कण पूजता है
ऐसा है मन भावन बनारस का सावन !

पंक्ति में खड़ी भक्ति है जिसमे शिव शक्ति है
मस्ती में डूबी हर बस्ती है भावना भी सस्ती है
चली फिर आज सावन की कश्ती है
सस्ती से सस्ती है मस्ती से मस्ती है
शिव को समर्पित सावन की भक्ति है
शक्ति को अर्पित सावन की मस्ती है
आज उगते सूरज के शहर में
आज सावन की मस्ती है !

यह कविता क्यों ? बड़ा ही मनभावन है बनारस का सावन जहाँ कण कण शिवमय हो जाता है रसमय हो जाता है शाशिमय हो जाता है सब रसमय हो जाता है जब बनारस में सावन आता है !
अरविन्द योगी

हे प्रभो तुम कहाँ हो ?

हे प्रभो ! तुम कहाँ हो ?
जहाँ देखो तुम वहां हो
मन में हो तन में हो
सृष्टि के कण कण में हो
मै अकिंचन जित खोजा
तित पाया तुमको
रोम रोम में धरा व्योम में
बेचारा चंचल सा मन
खोजता रहा हर जनम
करता रहा हर करम
तुझे पाने की तुझमे सामने की
पर तुम मेरे अंतर्मन में हो
सृष्टि के जन-जन में हो
पर बांवरा सा मेरा मन
तेरा अस्तित्व अनंत
खोजता है योगी सोचता है
तुम कहाँ हो? तुम कहाँ हो?
जहाँ तक दृष्टि पड़ती
तुम वहां हो फिर भी
हे प्रभो तुम कहाँ हो ?

यह कविता क्यों ? चंचल मन अंतर्मन में कल्पनाओं के पंख लगाकर अनंत सृष्टि में कौतुक दृष्टि से जिस ईश्वर की खोज यात्रा करता है सृष्टि के कण कण में है जीवन में है पर मन तो मन है न पूछ ही बैठता है की आखिर दुनिया की नाव चलने वाले नाविक प्रभो! तुम कहाँ हो ?
अरविन्द योगी

Saturday, 18 June 2011

श्रद्धा के आंसू

श्रद्धा के आंसू

श्रद्धा के आंसू बन गए जिग्यांसु
पवित्र थें विचित्र थें
अनंत बहाव था लगाव था
अनोखी धार बन प्यार
बरस रही थी तड़प रही थी
एहसासों के बादल
बन गएँ आँखों के काजल
भावना पवित्र थी
ज़िन्दगी सचित्र थी
अर्पण नहीं समर्पण की बेला थी!
ईस्वर की सब खेला थी
कल आज और कल
ज़िन्दगी का हर पल
जीने की अब बारी थी
ह्रदय से निकली वो प्रायश्चित हमारी थी
जीकर देखा श्रद्धा के आंसू को
कितने पवित्र कितने सच्चे
दिल से भोले बड़े अच्छे
बरस पड़ते थे एहसासों में घिरकर
उमड़ उमड़ कर घुमड़ घुमड़ कर
प्यार में अधिकार में
वो श्रद्धा के आंसू थे !
बह जाये तो भी उनके ना बहे तो भी उनके
कितनी ज़िन्दगी छिपी थी उन आंसुओं में
प्यार की भावना बही थी उन आंसुओं में
श्रद्धा के आंसू
हैवान को भगवान और
सैतान को इन्सान बनाती है
गर बरस जाये ह्रदय से
तो इन्सान को इन्सान बनाती है
योगी मन यही तो प्रायश्चित कहलाती है
जो श्रद्धा के आंसू बन ज़िन्दगी बहाती है!

यह कविता क्यों ? ह्रदय की वेदनाओं से पवित्र हो प्रायश्चित में जो आंसू मन के आँखों से निकलते हैं वो इन्सान को उसके इन्सान होने का एहसास दिला देते है और एक नई राह दिखाते है ! अरविन्द योगी

Wednesday, 1 June 2011

जिसे दुनिया भुला ना पायेगी !

जिसे दुनिया भुला ना पायेगी !

दौलत से तू प्यार न कर ये साथ ना तेरे जाएगी
प्यार करे तो इन्सान से कर जिसे दुनिया भुला न पायेगी !

स्वार्थ में अँधा हो तुने कितनो को सुलाया है
महल बनके अपनों के कितनो के घर जलाया है

मजे में अपने मगन रहा सुख दुःख ना औरो का जाना
इंसानों के कर्म है क्या ये तुने ना कभी पहचाना है

दुनिया को दुःख देने वाले मौत तुझे भी आएगी
प्यार करे तो इन्सान से कर जिसे दुनिया भुला न पायेगी !
जिनको तू कहता अपना-अपना,साथ ना वो तेरा देंगे
छीनके तेरी दौलत सारी दो ही गज कफ़न देंगे

तेरे बनाये महलो में तुझको ना ठहराएंगे
मौत तेरी आते ही तुझको जल्द से जल्द जलाएंगे

हँसता है तू जिन आँखों में बस दो पल को आंसू बहायेंगे
प्यार करे तो इन्सान से कर जिसे दुनिया भुला ना पायेगी !
यह कविता क्यों ? इन्सान का कर्म और धर्म सिर्फ प्यार पाना और देना है बस यही एक नेमत है जो जाने के बाद भी याद आती है बाकि सब माटी शरीर के साथ ख़त्म हो जाता है ! अरविन्द योगी १२/०५/२०११